खबरें और राजनीति

एक दूकान जिस पर ग्राहकों की भीड़ लगी है फिर भी दूकान घाटे में, क्या ये संभव है?

सीधे शब्दों में , क्या वो दूकान घाटे में जा सकती है जिस पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी है. लोग सामान ख़रीदने के लिए लाइन में लगे हैं. जिन्हें सामान नहीं मिल रहा है वो अगले दिन आ रहे हैं लेकिन सामान उपलब्ध नहीं है.

इस रेस्टोरेंट में परोसा जा रहा था इंसानों का मांस, पुलिस ने कराया बंद

हैवानियत की भी हद है, इस दुनिया में कैसे कैसे लोग होते हैं. इस रेस्टोरेंट में लोग इंसानी मांस खाते थे लेकिन ये बात उन्हें भी पता नहीं थी. जब पुलिस को ये हैवानियत पता चली तो तुरंत ही इस रेस्टोरेंट को बंद करा दिया गया.

खुशखबरी: फ्रीडम 251 की कैश ऑन डेलिवरी 28 जून से शुरू

रिंगिंग बेल्स कंपनी ने दावा किया है की वो अपने सबसे सस्ते फोन फ्रीडम 251 को 28 जून से डेलिवरी देना चालू कर रहे हैं.

कैराना कांड पर कुछ लाइने

चलो चले कुछ राजनीति कर आएं,

2017 आ गया है, चलो अपनी सरकार बनाये,

न हिन्दू लड़ें, न मुस्लिम लड़ें, चलो इन हिन्दू मुस्लिमों को लड़ायें,

टीना डाबी: सिविल सेवा टॉपर – क्या वास्तव में वो अयोग्य है?

अब बात करते हैं टीना डॉबी और अंकित की जिनका मेसेज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है की अंकित के ज्यादा नंबर होते हुए भी वो फेल हो गया और टीना के काम नंबर होते हुए भी वो आरक्षण के सहारे पास हो गयी.

भारत में जातिवाद: कौन कहता है जातिवाद ख़त्म हो गया है?

अभी कुछ दिनों की बात है, महाराष्ट्र के वाशिम जिले के कलाम्बेश्वर गाँव में रहने वाले बापूराव ताजडे की पत्नी को पड़ोसियों ने सिर्फ इसलिए कुएं से पानी नहीं भरने दिया क्यूंकि वो नीची जाति से थी.

देखें जापान से कितनी सस्ती है भारत की बुलेट ट्रेन

हम सब भारतवासी देश की पहली बुलेट ट्रेन चलने का बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं. इसी कड़ी में रेल

ये ट्रक वाले भी ना, क्या क्या लिखते हैं

हमारे देश में ट्रकों पर बहुत सारे सदविचार लिखे हुए मिल जाते हैं, लेकिन कभी कभी ये इतने फनी भी हो जाते हैं की हंसने को दिल करता है.

क्या आपने भारत की आखिरी चाय की दूकान देखी है?

उत्तराखंड के चमोली जिले में भारत-तिब्बत की सीमा से लगभग 24 किलोमीटर दूर एक गांव में भारत की अंतिम चाय की दूकान है. दरअसल यह गाँव ही भारत का अंतिम गाँव है. या यूँ कहें उधर से आने वालों के लिए यह भारत का पहला गाँव है और चाय की यह पहली दूकान है.

सुख और दुःख – बस यही तो है जिंदगी

इस कृषि प्रधान भारत देश को स्वतंत्र हुए साठ साल से भी ज्यादा हो गए हैं लेकिन किसानों की दशा वहीं की वहीं है. किसान तब भी कर्ज में डूबा था और अब भी कर्ज में डूबा है, पहले साहूकारों का, और अब खाद बीज वालों और आढ़तियों का.

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